Wednesday, February 4

राज्यपाल की शाही कुर्सी का रहस्य: शपथ ग्रहण से जुड़ी अनसुनी परंपरा:महाराष्ट्र राजभवन की शाही कुर्सी की ऐतिहासिक कहानी

किस्सा राज्यपाल की कुर्सी का: शपथ ग्रहण समारोह में शाही परंपरा की दिलचस्प कहानी- उमेश काशीकर

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राज्यपाल की शाही कुर्सी का रहस्य: शपथ ग्रहण से जुड़ी अनसुनी परंपरा
Governor Oath Ceremony: महाराष्ट्र राजभवन की शाही कुर्सी की ऐतिहासिक कहानी

महाराष्ट्र में राज्यपाल के शपथ ग्रहण समारोह के दौरान इस्तेमाल होने वाली शाही कुर्सी का इतिहास, परंपरा और प्रोटोकॉल। जानिए इससे जुड़े रोचक किस्से और संवैधानिक महत्व।

जगदिश का.काशीकर,मुक्त पत्रकार मुंबई महाराष्ट्र मो.9768425757

मुंबई | ज्ञानप्रवाह न्यूज- राज्यपाल के शपथ ग्रहण समारोह के दौरान दिखाई देने वाली भव्य और शाही कुर्सी केवल एक आसन नहीं, बल्कि वर्षों पुरानी परंपरा, संवैधानिक प्रोटोकॉल और ऐतिहासिक गरिमा का प्रतीक है। महाराष्ट्र के राजभवन में उपयोग की जाने वाली यह विशेष कुर्सी अपनी भव्यता और अनूठे डिज़ाइन के कारण हमेशा चर्चा का विषय रही है।

शपथ ग्रहण के समय परंपरागत रूप से सोने के रंग का मुलामा, त्रिमूर्ति व अशोक चक्र की राजमुद्रा, लाल मखमली गद्दी और हाथियों की सूंड के आकार के मजबूत लकड़ी के हत्थे वाली यह शाही कुर्सी प्रयोग में लाई जाती है। महाराष्ट्र लोकभवन में ऐसी दो भव्य कुर्सियाँ सुरक्षित रखी गई हैं, जिनकी नियमित देखभाल की जाती है।

पूर्व में, यदि शपथ ग्रहण समारोह में निवर्तमान और नव नियुक्त दोनों राज्यपाल उपस्थित रहते थे, तो दोनों कुर्सियाँ मंच पर रखी जाती थीं। शपथ से पहले प्रोटोकॉल के अनुसार निवर्तमान राज्यपाल वरिष्ठ माने जाते थे, लेकिन जैसे ही नए राज्यपाल शपथ लेते, वे तुरंत संवैधानिक रूप से वरिष्ठ हो जाते और दोनों अपने-अपने आसन बदलते थे। यह दृश्य शपथविधि की एक अनोखी परंपरा को दर्शाता था।

हालाँकि, ऐसा कोई संवैधानिक नियम नहीं है कि राज्यपाल को अनिवार्य रूप से इसी शाही कुर्सी पर बैठना ही होगा। कुछ राज्यपालों ने साधारण कुर्सी को प्राथमिकता दी है। वर्ष 2019 में राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी ने शपथ ग्रहण के दौरान साधारण कुर्सी पर बैठना ही पसंद किया था।

22 जनवरी 2010 को के. शंकरनारायणन के शपथ ग्रहण समारोह में तत्कालीन राज्यपाल एस. सी. जमीर भी उपस्थित थे। शपथ के बाद दोनों ने आसन बदलकर एक-दूसरे को गले लगाया—जो इस परंपरा का स्मरणीय क्षण बन गया। इसके बाद 2014 में ओमप्रकाश कोहली के अतिरिक्त प्रभार के समय दोनों कुर्सियों का उपयोग अंतिम बार हुआ।

पिछले एक दशक से अधिक समय में अधिकांश शपथ ग्रहण समारोहों में केवल एक ही शाही कुर्सी का प्रयोग किया गया है। शपथ समारोह के बाद ये कुर्सियाँ नए राज्यपाल के आगमन तक जलविहार सभागृह के दर्शनीय भाग में रखी जाती हैं और अन्य किसी भी कार्यक्रम में इनका उपयोग नहीं किया जाता।

यह शाही कुर्सी न केवल परंपरा की साक्षी है, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की गरिमा और संवैधानिक मूल्यों की मौन प्रतीक भी है।

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